May 04, 2026

कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर लिपुलेख दर्रे से तय किए गए मार्ग पर कड़ी आपत्ति जताई है।

नेपाल 04 मई : नेपाल ने रविवार को भारत और चीन की आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर लिपुलेख दर्रे से तय किए गए मार्ग पर कड़ी आपत्ति जताई है। नेपाल सरकार ने दावा किया है कि यह क्षेत्र काठमांडू के अधिकार क्षेत्र में आता है और इस तरह किसी भी यात्रा मार्ग को तय करने से पहले नेपाल से सलाह लेना आवश्यक है। नेपाली विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग को चुनने से पहले नेपाल से कोई परामर्श नहीं किया गया। मंत्रालय ने इसे एकतरफा निर्णय बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई है और कहा है कि ऐसे कदम क्षेत्रीय संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकते हैं।

यह विवाद तब सामने आया है जब भारत ने हाल ही में घोषणा की थी कि कैलाश मानसरोवर यात्रा इस वर्ष जून से अगस्त के बीच आयोजित की जाएगी और इसके लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग किया जाएगा। भारत ने पहले भी कई बार यह स्पष्ट किया है कि लिपुलेख दर्रा भारत के भू-भाग का हिस्सा है और इस पर उसका संप्रभु अधिकार है। नेपाल लंबे समय से इस क्षेत्र पर अपना दावा करता रहा है और भारत-नेपाल के बीच सीमा को लेकर यह मुद्दा पहले भी कई बार चर्चा में आ चुका है। लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्रों को लेकर दोनों देशों के बीच अलग-अलग मान्यताएं हैं, जिससे समय-समय पर कूटनीतिक तनाव भी देखने को मिला है।

नेपाल की इस ताजा आपत्ति के बाद दोनों देशों के बीच एक बार फिर सीमा विवाद से जुड़ी चर्चा तेज हो गई है। हालांकि भारत की ओर से अभी इस बयान पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन भारत का रुख पहले भी स्पष्ट रहा है कि ये क्षेत्र उसके प्रशासनिक और भौगोलिक अधिकार में आते हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा मानी जाती है। हर साल हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में भाग लेते हैं, जो भारत, नेपाल और चीन के विभिन्न मार्गों से होकर गुजरती है। लिपुलेख मार्ग को लेकर विवाद के कारण पहले भी इस यात्रा पर असर पड़ चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मुद्दों को संवाद और कूटनीतिक बातचीत के जरिए हल करना दोनों देशों के हित में है, क्योंकि सीमा विवादों का असर केवल यात्रा तक सीमित नहीं रहता बल्कि द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल नेपाल की आपत्ति के बाद यह मामला फिर से अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है और आने वाले दिनों में दोनों देशों के रुख पर सबकी नजर बनी रहेगी।

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