June 19, 2026

'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं': रहस्य, ड्रामा और हास्य का अनोखा संगम

फिल्म समीक्षा : हंसी, सस्पेंस और भावनाओं से भरपूर है 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं'

कलाकार: असरानी, भंवर सिंह पुंडीर, मिलिंद गुनाजी, जरीना वहाब, रक्षा गुप्ता, मुस्कान वर्मा, विष्णु शर्मा, अभिनव चौहान, मुश्ताक खान

निर्देशक: राकेश सावंत

शैली: थ्रिलर | ड्रामा | कॉमेडी

रेटिंग: ⭐⭐⭐½

दिग्गज अभिनेता असरानी की आखिरी फिल्मों में शामिल 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं' एक ऐसी मर्डर मिस्ट्री है, जिसमें सस्पेंस, पारिवारिक ड्रामा और हल्की-फुल्की कॉमेडी का मिश्रण देखने को मिलता है। फिल्म अपने रहस्यपूर्ण घटनाक्रम और कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय के दम पर दर्शकों का मनोरंजन करने की कोशिश करती है। असरानी की मौजूदगी इसे और भी खास बना देती है, वहीं भंवर सिंह पुंडीर अपनी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस से अलग छाप छोड़ते हैं।

कहानी

फिल्म की कहानी ठाकुर विश्वजीत सिंह और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। परिवार के भीतर चल रहे रिश्तों और तनाव के बीच एक ऐसी घटना घटती है, जो पूरे परिवार की जिंदगी बदल देती है। ठाकुर विश्वजीत सिंह के होने वाले दामाद की रहस्यमयी हत्या हो जाती है और शक की सुई उन्हीं की ओर घूमने लगती है। मामले की जांच इंस्पेक्टर देव और इंस्पेक्टर राणा को सौंपी जाती है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, कई नए राज सामने आते हैं और कहानी में लगातार नए मोड़ आते रहते हैं। परिवार के हर सदस्य पर शक होता है और दर्शक अंत तक यह जानने की कोशिश करते रहते हैं कि असली कातिल कौन है।

अभिनय

असरानी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका अनुभव, संवाद अदायगी और सहज अभिनय कई दृश्यों को प्रभावशाली बना देता है। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी दर्शकों को पुराने दौर की याद दिलाती है और यही बात फिल्म को भावनात्मक महत्व भी देती है। भंवर सिंह पुंडीर इंस्पेक्टर राणा के किरदार में प्रभावशाली नजर आते हैं। उन्होंने अपने किरदार की गंभीरता और जांच अधिकारी की जिम्मेदारी को संतुलित तरीके से निभाया है। कई महत्वपूर्ण दृश्यों में उनका अभिनय कहानी को मजबूती देता है। मिलिंद गुनाजी अपने किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं और रहस्य को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। जरीना वहाब और मुश्ताक खान भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं और फिल्म के मनोरंजन पक्ष को मजबूत बनाते हैं।

निर्देशन

राकेश सावंत ने एक युवा निर्देशक के रूप में फिल्म को मनोरंजक बनाए रखने की पूरी कोशिश की है। उन्होंने कहानी में रहस्य और ड्रामा को बनाए रखते हुए हल्के हास्य का भी समावेश किया है, जिससे फिल्म ज्यादा गंभीर नहीं हो जाती। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि निर्देशक ने सस्पेंस को अंत तक बरकरार रखने का प्रयास किया है। हालांकि कुछ जगहों पर कहानी थोड़ी अनुमानित लगती है, लेकिन कलाकारों का अभिनय दर्शकों की रुचि बनाए रखता है।

फाइनल वर्डिक्ट

'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं' एक ऐसी फिल्म है जो मर्डर मिस्ट्री, पारिवारिक ड्रामा और हल्की कॉमेडी का संतुलित मिश्रण पेश करती है। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत असरानी की यादगार मौजूदगी और भंवर सिंह पुंडीर का प्रभावशाली अभिनय है। अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जिनमें रहस्य के साथ पारिवारिक भावनाएं और मनोरंजन भी हो, तो यह फिल्म आपको पसंद आ सकती है। असरानी को बड़े पर्दे पर आखिरी बार देखने का भावनात्मक पहलू भी इसे खास बनाता है।

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