अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ स्विट्जरलैंड पहुंच गए
वॉशिंगटन/बर्न, 20 जून । पश्चिम एशिया में 108 दिन तक चले लंबे संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ स्विट्जरलैंड पहुंच गए हैं, जबकि ट्रंप के दामाद और वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर पहले से वहां मौजूद हैं।
न्यूज़ वेबसाइट 'एक्सियोस' के हवाले से तुर्किये की सरकारी संवाद समिति अनाडाेलू
एजेंसी ने बताया कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग्ची भी आज स्विट्जरलैंड पहुंच सकते हैं। हालांकि, वार्ता की शुरुआत लेबनान में इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच जारी तनाव के कारण टल गई थी।
इस बीच, शुक्रवार को इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम लागू होने के बाद अमेरिका-ईरान वार्ता को नई गति मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। सूत्रों का कहना है कि तेहरान ने स्पष्ट किया है कि लेबनान में स्थायी युद्धविराम कूटनीतिक प्रक्रिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और यह वार्ता की सफलता या विफलता तय कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि पेरिस के वर्साय पैलेस में 18 जून को दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित 14-सूत्री ज्ञापन का उद्देश्य लड़ाई को रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा अन्य जटिल मुद्दों पर विवादों को सुलझाने के लिए 60 दिन का समय निकालना था, ताकि एक अधिक टिकाऊ समझौता किया जा सके। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे मुद्दों पर बातचीत होगी।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार लेबनान में युद्धविराम लागू कराने में अमेरिका, कतर और ईरान की महत्वपूर्ण भूमिका रही। युद्धविराम के बाद तकनीकी स्तर की वार्ताओं को फिर से शुरू करने की तैयारी की जा रही है। जबकि बातचीत से बाहर रखे गए इज़राइल का कहना है कि वह इस समझौते का हिस्सा नहीं है।
ईरान के मंत्रालय ने बताया कि अराग्ची ने शुक्रवार को अपने पाकिस्तानी समकक्ष के साथ फोन पर बातचीत में कहा कि समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं (जिसमें लेबनान में लड़ाई खत्म करना भी शामिल है) के किसी भी उल्लंघन के लिए अमेरिका जिम्मेदार होगा।
लेबनान तब क्षेत्रीय युद्ध में घिर गया जब हिज़्बुल्लाह ने बीते 2 मार्च को इज़राइल पर गोलीबारी की, जिसके जवाब में इज़राइल ने उस समूह के खिलाफ हमला शुरू कर दिया और देश के दक्षिणी हिस्से में घुस गया। लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने इज़राइल के हालिया हमलों की निंदा की, लेकिन कहा कि तनाव बढ़ने से व्यापक युद्धविराम तक पहुंचने की कोशिशों में कोई बाधा नहीं आएगी।
अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने आउन से बात की और हिज़्बुल्लाह को निहत्था करने की ज़रूरत पर जोर दिया, साथ ही "पूरी तरह से संप्रभु" लेबनानी राज्य के लिए अमेरिकी समर्थन को दोहराया। उन्होंने 23 से 25 जून तक वाशिंगटन में इज़राइल-लेबनान बातचीत का अगला दौर आयोजित करने पर भी चर्चा की। लेबनान के राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि व्यापक युद्धविराम इन वार्ताओं का एक बुनियादी आधार है।
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल के हवाई हमलों के साथ 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध में कम से कम 7,000 लोग मारे गए हैं, जिनमें से ज़्यादातर ईरान और लेबनान के हैं। इसने ऊर्जा की कीमतों को भी बढ़ा दिया, जिससे दुनिया भर में महंगाई बढ़ गई।
शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, लेकिन लेबनान में युद्धविराम के बाद इसमें साप्ताहिक आधार पर लगभग 8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई; साथ ही इस सप्ताह समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की ढुलाई में तेजी आई।
युद्ध के दौरान ईरान द्वारा नाकेबंदी किए जाने से पहले इस जलडमरूमध्य से दुनिया भर में कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता था। होर्मुज जलडमरूमध्य का प्रबंधन करने के लिए ईरान द्वारा बनाई गई संस्था ने शुक्रवार को कहा कि वह अंतरिम समझौते की बातचीत के दौरान तय की गई फीस माफ कर देगी।
इस समझाैते में ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से राहत, अरबों डॉलर की संपत्ति को फ्रीज़िंग से हटाने और तेल निर्यात के लिए अमेरिका से तुरंत छूट मिलने की व्यवस्था है। इसमें ईरान के लिए 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण फंड और अन्य वित्तीय प्रोत्साहन भी शामिल हैं।
गाैरतलब है कि अमेरिका और ईरान के इस प्रस्तावित अंतरिम समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने, तेल आपूर्ति को स्थिर करने, ईरान पर लगे कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत तथा क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को रोकने जैसे प्रावधान शामिल बताए जा रहे हैं।
हालांकि, अमेरिका में इस समझौते को लेकर राजनीतिक विवाद भी जारी है। ट्रंप के कुछ रिपब्लिकन सहयोगियों ने आशंका जताई है कि प्रशासन ईरान को अत्यधिक रियायतें दे रहा है। वहीं ट्रंप ने समझौते का बचाव करते हुए कहा कि युद्ध ने ईरान को कमजोर कर दिया है और अमेरिका किसी दबाव में नहीं है।