वर्ष 2030 तक 95 हजार करोड़ का बाजार बन सकता है सहायक प्रौद्योगिकी क्षेत्र: एनसीपीईडीपी
नई दिल्ली, 24 जून । भारत में सहायक प्रौद्योगिकी (असिस्टिव टेक्नोलॉजी) क्षेत्र वर्ष 2030 तक 75 हजार से 95 हजार करोड़ रुपये का बाजार बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उपयुक्त नीतिगत ढांचा और निवेश व्यवस्था विकसित की जाए तो, यह क्षेत्र न केवल दिव्यांगजनों के जीवन को अधिक स्वतंत्र और सम्मानजनक बनाएगा, बल्कि नवाचार, उद्यमिता और रोजगार सृजन का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
यह निष्कर्ष राष्ट्रीय दिव्यांगजन रोजगार संवर्धन केंद्र (एनसीपीईडीपी) और एमफैसिस के सहयोग से तैयार श्वेत पत्र ‘असिस्टिव टेक्नोलॉजी इन इंडिया: ए सिस्टम्स एंड इन्वेस्टमेंट अप्रोच फॉर इंक्लूजन, इंडिपेंडेंस एंड इकोनॉमिक पार्टिसिपेशन ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज’ में सामने आया। बुधवार को आयोजित कार्यक्रम में इस श्वेत पत्र का विमोचन किया गया।
विशेषज्ञों ने कहा कि सहायक प्रौद्योगिकी की आवश्यकता केवल दिव्यांगजनों तक सीमित नहीं है। देश में करोड़ों बुजुर्गों के साथ-साथ मधुमेह, डिमेंशिया, दृष्टि और श्रवण संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोग भी व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र, चश्मा, सफेद छड़ी, वॉयस रिकग्निशन सॉफ्टवेयर और अन्य सहायक उपकरणों पर निर्भर हैं। ऐसे में इस क्षेत्र का विस्तार सामाजिक समावेशन के साथ-साथ आर्थिक विकास का भी महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (डीईपीडब्ल्यूडी) की अतिरिक्त सचिव डॉ मनमीत कौर नंदा ने कहा कि भारत के पास विश्वस्तरीय और समावेशी सहायक प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने का बड़ा अवसर है। सहायक प्रौद्योगिकी स्वतंत्रता, सम्मान और समाज में समान भागीदारी सुनिश्चित करने का एक प्रभावी माध्यम है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि श्वेत पत्र में प्रस्तुत सुझाव भविष्य की नीतियों को दिशा देने में सहायक सिद्ध होंगे।
श्वेत पत्र में इस क्षेत्र के समक्ष मौजूद कई चुनौतियों की पहचान की गई है। इनमें विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच जिम्मेदारियों का बिखराव, सेवाओं की सीमित उपलब्धता, वित्तीय सहायता की कमी, जागरूकता का अभाव तथा उपकरणों के रखरखाव और मरम्मत की कमजोर व्यवस्था प्रमुख हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए राष्ट्रीय सहायक प्रौद्योगिकी नीति तैयार करने, मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने, गुणवत्ता मानकों को मजबूत बनाने, बीमा आधारित कवरेज बढ़ाने, कौशल विकास को प्रोत्साहित करने और प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने की सिफारिश की गई है।
एनसीपीईडीपी के कार्यकारी निदेशक अरमान अली ने कहा कि सहायक प्रौद्योगिकी को केवल उपकरण वितरण की योजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह तय करती है कि कोई बच्चा शिक्षा प्राप्त कर पाएगा या नहीं, कोई व्यक्ति रोजगार हासिल कर पाएगा या नहीं और कोई बुजुर्ग सम्मानपूर्वक स्वतंत्र जीवन जी सकेगा या नहीं। देश को अब एक व्यापक राष्ट्रीय सहायक प्रौद्योगिकी नीति की आवश्यकता है, जो इस क्षेत्र को समग्र दृष्टिकोण से आगे बढ़ाए।
एमफैसिस की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट एवं ईएसजी प्रमुख दीपा नागराज ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी दिव्यांग आबादी वाले देशों में से एक है। यदि इस क्षेत्र में निवेश और नवाचार को बढ़ावा दिया जाए तो यह न केवल एक बड़े आर्थिक अवसर के रूप में उभर सकता है, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बन सकता है।
सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया के निदेशक सुबोध सचन ने कहा कि भारत के पास स्टार्टअप, अनुसंधान संस्थानों, डिजिटल अवसंरचना और विनिर्माण क्षमता का मजबूत आधार मौजूद है। समन्वित नीति और निवेश ढांचे के माध्यम से देश सहायक प्रौद्योगिकी नवाचार का वैश्विक केंद्र बन सकता है।
कार्यक्रम में नीति निर्माता, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, शोधकर्ता, दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। इनमें एनसीपीईडीपी के अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता, एमफैसिस की दीपा नागराज, एसटीपीआई के राकेश दुबे, उद्योगपति स्मिनु जिंदल तथा आईसीएमआर के वैज्ञानिक डॉ. रविंदर सिंह प्रमुख रूप से शामिल थे।