April 02, 2026

जब अंतरिक्ष यान पृथ्वी से लाखों या करोड़ों किलोमीटर दूर चंद्रमा, मंगल या अन्य ग्रहों की यात्रा पर होते हैं

नई दिल्ली: जब अंतरिक्ष यान पृथ्वी से लाखों या करोड़ों किलोमीटर दूर चंद्रमा, मंगल या अन्य ग्रहों की यात्रा पर होते हैं, तब उनके साथ निरंतर संपर्क बनाए रखना बहुत चुनौतीपूर्ण काम होता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के पास इस चुनौती का समाधान है- डीप स्पेस नेटवर्क के रुप में जिसे डीएसएन भी कहा जाता है। डीप स्पेस नेटवर्क दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे साइंटिफिक टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम है, जो दूरस्थ अंतरिक्ष मिशनों को पृथ्वी से जोड़े रखता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, डीप स्पेस नेटवर्क नासा का एक अंतरराष्ट्रीय रेडियो एंटीना नेटवर्क है। यह न सिर्फ अंतरिक्ष यानों को निर्देश भेजता है बल्कि उनसे मिलने वाले वैज्ञानिक डेटा, तस्वीरें और सिग्नल को भी पृथ्वी पर पहुंचाता है।

डीएसएन का संचालन नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (जेपीएल) करती है। यह नेटवर्क तीन मुख्य केंद्रों पर आधारित है, जो दुनिया भर में लगभग 120 डिग्री की दूरी पर स्थित हैं, पहला गोल्डस्टोन कैलिफोर्निया (अमेरिका) में दूसरा मैड्रिड (स्पेन) में और तीसरा कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) में स्थित है। इन तीनों केंद्रों को इस तरह चुना गया है कि पृथ्वी घूमने पर भी कोई अंतरिक्ष यान डीएसएन की नजर से कभी पूरी तरह ओझल न हो। जब एक केंद्र से यान क्षितिज से नीचे चला जाता है, तो दूसरा केंद्र तुरंत उसका सिग्नल पकड़ लेता है।

अब सवाल है कि डीएसएन कैसे काम करता है? वैज्ञानिकों के अनुसार इसमें बड़े-बड़े पैराबॉलिक डिश एंटीना लगे हैं। इनमें सबसे बड़ा 70 मीटर व्यास वाला एंटीना है, जो अरबों किलोमीटर दूर से आने वाले बेहद कमजोर रेडियो सिग्नलों को भी पकड़ने में सक्षम है। ये एंटीना अंतरिक्ष यानों को कमांड भेजते हैं, उनकी स्थिति की निगरानी करते हैं और वैज्ञानिक डेटा वापस पृथ्वी पर लाते हैं। डीएसएन सिर्फ कम्युनिकेशन का साधन नहीं है। यह रडार और रेडियो एस्ट्रोनॉमी के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे वैज्ञानिक क्षुद्रग्रहों यानी एस्टेरॉयड, ग्रहों और चंद्रमाओं के अंदरूनी हिस्सों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं।

डीप स्पेस नेटवर्क एस्ट्रोनॉमी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार आज नासा के अधिकांश गहरे अंतरिक्ष मिशन जैसे मंगल पर भेजे गए रोवर, जुपिटर और शनि के मिशन या वॉयेजर जैसे दूरस्थ यान डीएसएन पर ही निर्भर हैं। बिना डीएसएन के इन यानों से संपर्क रखना लगभग असंभव होता। यही नहीं डीएसएन की मदद से वैज्ञानिक पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन, ब्रह्मांड की संरचना और सौर मंडल की गहराइयों को बेहतर ढंग से समझ पा रहे हैं। भविष्य में चंद्रमा, मंगल और उससे आगे के मिशनों के लिए डीएसएन और भी महत्वपूर्ण होने वाला है।

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