June 20, 2026

अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी में धुंध भरी पहाड़ी सड़कों पर उड़ती हुई पाई गई एक तितली, विज्ञान के लिए एक नई प्रजाति साबित हुई है।

अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी में धुंध भरी पहाड़ी सड़कों पर उड़ती हुई पाई गई एक तितली, विज्ञान के लिए एक नई प्रजाति साबित हुई है। यह खोज जैविक खोजों के केंद्र (हॉटस्पॉट) के तौर पर पूर्वोत्तर के बढ़ते महत्व को दिखाती है। शोधकर्ताओं ने निचली दिबांग घाटी ज़िले के मायोडिया दर्रे (पास) से इस नई प्रजाति का वर्णन किया है, जिसका नाम 'चोनाला एल्बिस्ट्रिक्टा' (Chonala albistricta) या 'नैरो-बैंडेड वॉल' (Narrow-banded Wall) रखा गया है। यह खोज इस हफ़्ते अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'ज़ूटैक्सा' (Zootaxa) में प्रकाशित हुई।

इस तितली की पहचान अगस्त 2025 में लगभग 2,600 मीटर की ऊंचाई पर इकट्ठा किए गए तीन नमूनों से की गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अपनी सबसे करीबी ज्ञात प्रजाति 'चोनाला मेसोनी' (Chonala masoni) से अलग है। 'चोनाला मेसोनी' सिक्किम और तिब्बत के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। नई प्रजाति पंखों के पैटर्न, शरीर की विशेषताओं और नर जननांगों की बनावट में उससे अलग है। इस अध्ययन का नेतृत्व नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज के कृष्णमेघ कुंटे ने किया, जिसमें फहीम खान और उज्ज्वला पवार भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने दिबांग घाटी में फील्ड सर्वे के दौरान इस तितली की खोज की। दिबांग घाटी अपनी असाधारण जैव विविधता के लिए तेज़ी से पहचानी जा रही है।

इस खोज को खास बनाने वाली बात यह है कि यह तितली 'चोनाला' (Chonala) जीनस से संबंधित है, जो पहाड़ी तितलियों का एक कम ज्ञात समूह है। हालांकि इस जीनस का वर्णन पहली बार 130 साल से भी पहले किया गया था, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी दस ज्ञात प्रजातियों में से सात की खोज पिछले तीन दशकों में ही हुई है। इससे पता चलता है कि पूर्वी हिमालय की दूर-दराज की पर्वत श्रृंखलाओं में अभी भी ऐसी प्रजातियां हो सकती हैं जिनकी खोज नहीं हुई है।

तितली का दायरा बहुत सीमित लगता है। अब तक इसे केवल मायोडिया दर्रे में ही देखा गया है, हालांकि शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि यह दिबांग घाटी, सियांग घाटी और आसपास के इलाकों में भी पाई जा सकती है। अध्ययन के अनुसार, यह प्रजाति उपोष्णकटिबंधीय सदाबहार जंगलों में खुली पथरीली ढलानों पर रहती है। जुलाई और अगस्त के बीच इसके छोटे से उड़ान के मौसम के दौरान इसे अक्सर चट्टानों और पहाड़ी सड़कों पर धूप सेंकते हुए देखा जाता है।

यह खोज इस बात पर भी ज़ोर देती है कि पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता के बारे में अभी भी कितनी जानकारी बाकी है। शोधकर्ताओं को प्रमुख प्राकृतिक इतिहास संग्रहों में इस प्रजाति का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिला। इससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में दशकों से तितलियों पर शोध होने के बावजूद यह प्रजाति वैज्ञानिकों की नज़र से बची रही। अपने शोध पत्र में, वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि पूर्वोत्तर भारत से लेकर चीन तक फैले अलग-थलग पहाड़ी दर्रों में 'चोनाला' की और भी ऐसी प्रजातियां हो सकती हैं जिनकी खोज अभी नहीं हुई है। उनका तर्क है कि हिमालय के दूर-दराज़ इलाकों तक बेहतर पहुँच और बायोडायवर्सिटी सर्वे में नई दिलचस्पी की वजह से ऐसी प्रजातियों का पता चल रहा है जो पीढ़ियों से छिपी हुई थीं। इस खोज से अरुणाचल प्रदेश में मिलने वाली नई प्रजातियों की सूची और लंबी हो गई है, जिससे बायोडायवर्सिटी की खोज के लिए भारत के सबसे अहम इलाकों में से एक के तौर पर राज्य की पहचान और मज़बूत हुई है।

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