April 17, 2026

आधुनिक भारत के गुरु: डॉ. राधाकृष्णन और उनका छात्र-वत्सल

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का व्यक्तित्व भारतीय दर्शन, शिक्षा और राजनीति के आकाश में एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के समान है, जिसकी चमक युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी। वे न केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति थे, बल्कि एक महान दार्शनिक, प्रखर वक्ता और एक आदर्श शिक्षक भी थे। उनके सम्मान में प्रतिवर्ष 5 सितंबर को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाना इस बात का प्रमाण है कि वे राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका को सर्वोपरि मानते थे। 

उनका जन्म 5 सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुत्तनी में एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही मेधावी रहे राधाकृष्णन जी ने अपनी शिक्षा के दौरान दर्शनशास्त्र को अपना मुख्य विषय बनाया और भारतीय उपनिषदों व वेदों का गहरा अध्ययन किया। उनका मानना था कि शिक्षा केवल जानकारी एकत्र करना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के चरित्र का निर्माण करने और उसे सत्य की खोज के योग्य बनाने की एक सतत प्रक्रिया है।

डॉ. राधाकृष्णन का भारतीय दर्शन के प्रति समर्पण अद्वितीय था। उन्होंने पश्चिमी जगत के सामने भारतीय चिंतन की श्रेष्ठता को तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उस समय जब दुनिया भारतीय संस्कृति को केवल कर्मकांडों का समूह मानती थी, तब राधाकृष्णन जी ने ऑक्सफोर्ड और शिकागो जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह सिद्ध किया कि भारतीय दर्शन न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि अत्यंत तार्किक और वैज्ञानिक भी है।

 उनका प्रसिद्ध कथन था कि "ज्ञान हमें शक्ति देता है, लेकिन प्रेम हमें परिपूर्णता देता है।" उन्होंने पूरब और पश्चिम के विचारों के बीच एक सेतु का कार्य किया, जिससे दुनिया को यह समझ आया कि मानवता के कल्याण के लिए आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ज्ञान आवश्यक हैं। एक दार्शनिक के रूप में उनकी ख्याति इतनी अधिक थी कि जब वे राष्ट्रपति बने, तो विश्व के महान दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने इसे 'दर्शन का सम्मान' कहा था।

शिक्षक के रूप में डॉ. राधाकृष्णन का व्यवहार इतना आत्मीय और प्रेरणादायक था कि उनके छात्र उन्हें अपना मार्गदर्शक और मित्र मानते थे। जब वे मैसूर विश्वविद्यालय से कलकत्ता विश्वविद्यालय जा रहे थे, तब उनके छात्रों ने उन्हें फूलों से सजी बग्घी में बैठाया और स्वयं उस बग्घी को खींचकर रेलवे स्टेशन तक ले गए थे। यह उनके प्रति छात्रों के अगाध प्रेम और सम्मान का अनूठा उदाहरण है।

 राष्ट्रपति बनने के बाद जब कुछ मित्र और शिष्य उनका जन्मदिन मनाना चाहते थे, तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा कि "मेरे जन्मदिन को अलग से मनाने के बजाय, यदि इसे 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाए, तो यह मेरे लिए गर्व की बात होगी।" उनका यह विचार दर्शाता है कि उनके हृदय में शिक्षकों के प्रति कितनी गहरी श्रद्धा थी। वे मानते थे कि राष्ट्र के भाग्य का निर्माण कक्षाओं में होता है और शिक्षक ही उस भाग्य के सच्चे शिल्पी हैं।

राजनीति में डॉ. राधाकृष्णन की उपस्थिति सादगी और उच्च नैतिक मूल्यों का प्रतीक थी। एक कूटनीतिज्ञ के रूप में सोवियत संघ में भारत के राजदूत रहते हुए उन्होंने स्टालिन जैसे कड़े व्यक्तित्व को भी अपनी सादगी और विद्वत्ता से प्रभावित कर दिया था। राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक स्वर्ण युग के समान था, जहाँ उन्होंने संविधान की मर्यादाओं का पालन करते हुए सरकार को सदैव जनहित के कार्यों के लिए प्रेरित किया। 

उनके पास न केवल राजनीतिक समझ थी, बल्कि एक ऐसी वैश्विक दृष्टि थी जो वसुधैव कुटुंबकम् (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) की भावना से ओत-प्रोत थी। उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत किया गया, जो उनके द्वारा देश की बौद्धिक और राजनीतिक सेवा के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र का नमन था।

डॉ. राधाकृष्णन का संदेश अत्यंत सकारात्मक और ऊर्जावान है— "शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को ठूंसे, बल्कि वह है जो उसे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करे।" आज के तकनीकी युग में भी उनके विचार हमें याद दिलाते हैं कि मशीनें जानकारी दे सकती हैं, लेकिन संस्कार और जीवन मूल्य केवल एक गुरु ही दे सकता है।

 उनका जीवन हमें सिखाता है कि विनम्रता विद्वत्ता का सबसे सुंदर आभूषण है। वे एक ऐसे महान पुरुष थे जिन्होंने शक्ति और पद को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, बल्कि सदैव अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति से जुड़े रहे। उनका लेखन और उनके भाषण आज भी न्याय, शांति और शिक्षा की मशाल के रूप में दुनिया का मार्गदर्शन करते हैं।

अतः डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का व्यक्तित्व और कृतित्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम ज्ञान की खोज को कभी न रोकें और सदैव एक विद्यार्थी की तरह सीखते रहें। उनका जीवन अनुशासन, सत्यनिष्ठा और मानवता के प्रति प्रेम का एक ऐसा पाठ है, जिसे हर नागरिक को अपने जीवन में उतारना चाहिए।

 वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार थे, जो हमें सिखाते हैं कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य एक बेहतर मनुष्य का निर्माण करना है। उनकी जयंती हमें आत्म-चिंतन करने और अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है, ताकि हम भी उनके पदचिह्नों पर चलते हुए एक सुसंस्कृत और समृद्ध भारत के निर्माण में अपना योगदान दे सकें।

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