छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि, दैनिक वेतन भोगी भी ग्रेच्युटी के हकदार
रायपुर, 03 जुलाई । छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आज (शुक्रवार) अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दैनिक वेतनभोगी के रूप में दी गई सेवाओं को भी ग्रेच्युटी के लिए गिना जाएगा और कर्मचारी इसके हकदार हैं। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने राज्य सरकार की सभी 9 रिट याचिकाएं खारिज करते हुए यह बड़ा फैसला दिया है।
जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने जल संसाधन विभाग के सदानंद मानिकपुरी, बाबूलाल साहू और अन्य कर्मचारियों के मामलों की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की याचिकाओं को खारिज कर यह निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कर्मचारियों को 25 साल तक सेवा देने के बाद भी अदालत के चक्कर कटवाना पूरी तरह से गलत है। इन कर्मचारियों ने दैनिक वेतनभोगी के रूप में लंबी सेवाएं दी थीं, जिसके बाद उन्हें नियमित किया गया था। ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत सक्षम प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें दैनिक वेतनभोगी अवधि की भी ग्रेच्युटी देने का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं।
राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए अदालत में शासकीय अधिवक्ता विनय पांडे ने तर्क दिया कि इसी तरह के एक मामले धनसाई साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य में उच्चतम न्यायालय ने इस कानूनी बिंदु को तीन जजों की बड़ी बेंच को रेफर किया है। चूंकि मामला देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष लंबित है इसलिए उच्च न्यायालय को इस मामले की सुनवाई तब तक टाल देनी चाहिए। कर्मचारियों की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता विनोद देशमुख ने उच्चतम न्यायालय के ही नेत्राम साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य 2018 फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय पहले ही यह तय कर चुका है कि कल्याणकारी राज्य में वर्षों तक कम वेतन पर काम लेने के बाद कर्मचारियों को ग्रेच्युटी से वंचित करना न्याय का मज़ाक होगा।
उच्च न्यायालय ने कर्मचारियों के पक्ष को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया। उच्चतम न्यायालय के अशोक सदारंगानी 2012 मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सिर्फ इस आधार पर मामले को अनिश्चितकाल के लिए नहीं टाला जा सकता कि कोई संदर्भ बड़ी बेंच के पास लंबित है। जब तक कोई बड़ी बेंच पुराना फैसला बदल नहीं देती, तब तक पुराना कानून ही लागू रहेगा।
अदालत ने पूर्व के फैसलों को दोहराते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने 22-25 साल तक दैनिक वेतनभोगी के रूप में निरंतर सेवा दी है और बाद में उसे नियमित किया गया है तो विभाग को स्वेच्छा से उसे ग्रेच्युटी का भुगतान करना चाहिए, न कि उसे अदालतों के चक्कर काटने पर मजबूर करना चाहिए।
अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में माना कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत दैनिक वेतनभोगी और नियमित कर्मचारियों के बीच कोई अंतर नहीं है। इस फैसले से उन सभी कर्मचारियों को लाभ मिलेगा, जिन्होंने लंबी अवधि तक दैनिक वेतनभोगी के रूप में सेवाएं दी हैं और बाद में उन्हें नियमित कर दिया गया है।