April 15, 2026

शहरों को वित्तीय रूप से सक्षम बनाने को केंद्र ने जारी की अर्बन चैलेंज फंड की गाइडलाइंस

नई दिल्ली, 15 अप्रैल । देश में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बुनियादी ढांचे की बढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने शहरों को आत्मनिर्भर और वित्तीय रूप से सक्षम बनाने के लिए ‘अर्बन चैलेंज फंड’ (यूसीएफ) की गाइडलाइन्स की शुरुआत की। जो शहरों को पारंपरिक अनुदान आधारित मॉडल से बाहर निकाल कर उन्हें बाजार आधारित वित्त पोषण की दिशा में ले जाएगी, ताकि वे दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ और विकास के नए केंद्र बन सकें।

केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल ने बुधवार को राजधानी स्थित कर्तव्य भवन में इस फंड की गाइडलाइन्स और इसके अंतर्गत क्रेडिट रिपेमेंट गारंटी सब-स्कीम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, जिनमें प्रमुख सचिव श्रीनिवास कटिकिथाला और सचिव डी थारा सहित राज्यों के शहरी विकास विभागों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

मनोहर लाल ने कहा कि अर्बन चैलेंज फंड भारत के शहरी विकास दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव है। यह केवल अनुदान देने की योजना नहीं है बल्कि सार्वजनिक धन का उपयोग कर बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करने और शहरों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने का प्रयास है। देश के शहर आर्थिक विकास, नवाचार और रोजगार सृजन के इंजन बन रहे हैं और ‘विकसित भारत 2047’ की परिकल्पना तभी साकार होगी जब शहरों की योजना, वित्त और शासन प्रभावी ढंग से किया जाए।

उन्होंने कहा कि अमृत, स्वच्छ भारत मिशन और स्मार्ट सिटीज मिशन जैसी पहल ने शहरी ढांचे को मजबूत किया है, लेकिन अब अगला चरण शहरों को निवेश आकर्षित करने योग्य और वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाने का है। यह फंड पुराने शहर क्षेत्रों और बाजारों के पुनर्विकास, शहरी गतिशीलता, अंतिम मील कनेक्टिविटी, नॉन-मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट, जल और स्वच्छता ढांचे तथा जलवायु अनुकूल विकास जैसी परियोजनाओं को समर्थन देगा।

प्रमुख सचिव श्रीनिवास कटिकिथाला ने कहा कि भारत का शहरीकरण निर्णायक चरण में प्रवेश कर रहा है और अर्बन चैलेंज फंड एक बाजार-आधारित, सुधार-उन्मुख और परिणामोन्मुख ढांचा बनाएगा। यह फंड वित्तीय स्थिरता और संस्थागत मजबूती के साथ परियोजनाओं की बैंकबिलिटी और वित्तीय अनुशासन पर जोर देगा। इस फंड की सफलता केंद्र, राज्यों और शहरी स्थानीय निकायों के बीच सतत सहयोग और सुधारों व क्षमता निर्माण पहलों के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यह पहल शहरों को निवेश आकर्षित करने योग्य बनाने के साथ-साथ उन्हें दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाएगी।

इस अवसर पर एक ई-डायरेक्टरी भी लॉन्च की गई, जो शहरों को वित्तीय संस्थानों, बैंकों और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से जोड़ने का काम करेगी। कार्यक्रम में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय और सभी राज्यों के बीच एक समझौता ज्ञापन का डिजिटल हस्ताक्षर भी किया गया, जिससे इस फंड के प्रभावी क्रियान्वयन के प्रति सहयोगात्मक प्रतिबद्धता की पुष्टि हुई। इसके अलावा, शैक्षणिक और शोध संस्थानों, क्षमता निर्माण केंद्रों, बैंकों, एनबीएफसी, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और मर्चेंट बैंकरों सहित प्रमुख हितधारकों के साथ आशय पत्रों पर भी डिजिटल हस्ताक्षर किए गए। निजी क्षेत्र की संस्थाओं ने भी इसमें भाग लिया, जिससे वित्तपोषण, क्षमता निर्माण और शहरी परिवर्तन परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।

सरकार ने इस फंड के तहत वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक कुल 1 लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता देने का लक्ष्य तय किया है। यह सहायता सीधे अनुदान के रूप में नहीं बल्कि एक उत्प्रेरक निवेश के रूप में दी जाएगी। कुल आवंटन में से 90,000 करोड़ रुपये परियोजनाओं के लिए, 5,000 करोड़ रुपये परियोजना तैयारी और क्षमता निर्माण के लिए तथा 5,000 करोड़ रुपये क्रेडिट रिपेमेंट गारंटी सब-स्कीम के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस फंड में हिस्सेदारी का ढांचा स्पष्ट किया गया है।

परियोजना की कुल लागत का अधिकतम 25 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि कम से कम 50 प्रतिशत राशि बाजार आधारित स्रोतों जैसे बैंक ऋण, बॉन्ड या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के माध्यम से जुटानी होगी। शेष राशि राज्यों और शहरी स्थानीय निकायों की ओर से आएगी। इस सब-स्कीम का उद्देश्य छोटे शहरों, विशेषकर टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा पहाड़ी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के शहरों को बाजार आधारित वित्तपोषण तक पहुंच दिलाना है।

इसके तहत केंद्र सरकार द्वारा स्थापित ट्रस्ट फंड के माध्यम से शहरी निकायों को लिए गए ऋण पर गारंटी कवर प्रदान किया जाएगा, जिससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों का जोखिम कम होगा। पहले प्रोजेक्ट के लिए ऋण राशि का अधिकतम 70 प्रतिशत या 7 करोड़ रुपये तक की गारंटी दी जा सकती है, जबकि बाद की परियोजनाओं के लिए यह सीमा 50 प्रतिशत तक होगी। इसके अलावा, इस योजना के अंतर्गत कोई अतिरिक्त पैसा नहीं मांगा जाएगा, जिससे छोटे और मध्यम शहरों को वित्तीय सहायता प्राप्त करने में आसानी होगी।

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